श्री दुर्गा सप्तशती पाठ की पूर्ण जानकारी, पाठ करने की विधी, नवरात्री में है विशेष है महत्वता
दुर्गा सप्तशती पाठ—अद्भुत शक्तियां प्रदान करता है-
देव श्रीवास्तव केडीएस न्यूज़ नेटवर्क
लखीमपुर खीरी- नवरात्र के दौरान माता को प्रसन्न करने के लिए साधक विभिन्न प्रकार के पूजन करते हैं जिनसे माता प्रसन्न उन्हें अद्भुत शक्तियां प्रदान करती हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का नियमित पाठ विधि-विधान से किया जाए तो माता बहुत प्रसन्न होती हैं। दुर्गा सप्तशती में (700) सात सौ प्रयोग है।
दुर्गा सप्तशती पाठ विधि-
सर्वप्रथम साधक को स्नान कर शुद्ध हो जाना चाहिए।
तत्पश्चात वह आसन शुद्धि की क्रिया कर आसन पर बैठ जाए।
माथे पर अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें।
शिखा बाँध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर चार बार आचमन करें।
इसके बाद प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर देवी को अर्पित करें तथा मंत्रों से संकल्प लें।
देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार विधि से पुस्तक की पूजा करें..
फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए।
इसके बाद उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है। इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है।
इसके जप के पश्चात् मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए।
तत्पश्चात पूरे ध्यान के साथ माता दुर्गा का स्मरण करते हुए दुर्गा सप्तशती पाठ करने से सभी प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी हो जाती हैं।
“दुर्गा सप्तशती” साल में चार नवरात्र होते हैं, ये शायद बहुत कम लोगों को पत्ता होता है | सर्वोत्तम माह महिना की नवरात्री की मान्यता है | किन्तु क्रम इस प्रकार है -चैत्र, आषाढ़, आश्विन, और माह | प्रायः “उत्तर भारत” में चैत्र एवं आश्विन की नवरात्री लोग विशेष धूम धाम से मानते हैं,
दुर्गा सप्तशती का अर्थ-
दुर्गा अर्थात दुर्ग शब्द से दुर्गा बना है, दुर्ग =किला, स्तंभ, शप्तशती अर्थात सात सौ | जिस ग्रन्थ को सात सौ श्लोकों में समाहित किया गया हो उसका नाम शप्तशती है |
महत्व - जो कोई भी इस ग्रन्थ का अवलोकन एवं पाठ करेगा “माँ जगदम्बा” की उसके ऊपर असीम कृपा होगी।
कथा –
“सुरथ और “समाधी ” नाम के राजा एवं वैश्य का मिलन किसी वन में होता है ,और वे दोनों अपने मन में विचार करते हैं, कि हमलोग राजा एवं सभी संपदाओं से युक्त होते हुए भी अपनों से विरक्त हैं ,किन्तु यहाँ वन में, ऋषि के आश्रम में, सभी जीव प्रसन्नता पूर्वक एकसाथ रहते हैंं। यह आश्चर्य लगता है ,कि क्या कारण है ,जो गाय के साथ सिंह भी निवास करता है, और कोई भय नहीं है,जब हमें अपनों ने परित्याग कर दिए, तो फिर अपनों की याद क्यों आती है। वहाँ ऋषि के द्वारा यह ज्ञात होता है ,कि यह उसी ” महामाया ” की कृपा है ,सो पुनः ये दोनों ” दुर्गा” की आराधना करते हैं ,और “शप्तशती ” के बारहवे अध्याय में आशीर्वाद प्राप्त करते हैं ,और अपने परिवार से युक्त भी हो जाते हैं।
पं कमल किशोर मिश्र के अनुसार जो कोई भी” माँ जगदम्बा “की शरण लेगा, उसके ऊपर माँ की असीम कृपा होगी ,संसार की समस्त बाधा का निवारण करेंगीं – अतः सभी को “दुर्गा शप्तशती ” का पाठ तो करने ही चाहिए ,और इस ग्रन्थ को अपने कुलपुरोहित से जानना भी चाहिए….
दुर्गा सप्तशती के अलग-अलग प्रयोग से कामनापूर्ति—
लक्ष्मी, ऐश्वर्य, धन संबंधी प्रयोगों के लिए पीले रंग के आसन का प्रयोग करें।
वशीकरण, उच्चाटन आदि प्रयोगों के लिए काले रंग के आसन का प्रयोग करें। बल, शक्ति आदि प्रयोगों के लिए लाल रंग का आसन प्रयोग करें।
सात्विक साधनाओं, प्रयोगों के लिए कुश के बने आसन का प्रयोग करें
वस्त्र - लक्ष्मी संबंधी प्रयोगों में आप पीले वस्त्रों का ही प्रयोग करें। यदि पीले वस्त्र न हो तो मात्र धोती पहन लें एवं ऊपर शाल लपेट लें। आप चाहे तो धोती को केशर के पानी में भिगोंकर पीला भी रंग सकते हैं।
इन वस्तुओ से हवन करने पर-
जायफल से कीर्ति और किशमिश से कार्य की सिद्धि होती है।
आंवले से सुख और केले से आभूषण की प्राप्ति होती है। इस प्रकार फलों से अर्ध्य देकर यथाविधि हवन करें।
खांड, घी, गेंहू, शहद, जौ, तिल, बिल्वपत्र, नारियल, किशमिश और कदंब से हवन करें।
गेंहूं से होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
खीर से परिवार, वृद्धि, चम्पा के पुष्पों से धन और सुख की प्राप्ति होती है।
आवंले से कीर्ति और केले से पुत्र प्राप्ति होती है।
कमल से राज सम्मान और किशमिश से सुख और संपत्ति की प्राप्ति होती है।
खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों के मतानुसार इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। नवरात्र व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।
दुर्गा सप्तशती के अध्याय से कामनापूर्ति-
1- पहला अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
2- दूसरा अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।
3- तीसरा अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।
4- चौथा अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।
5- पाँचवाँ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।
6- छठा अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।
7- सातवाँ अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।
8- आठवाँ अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।
9- नवाँ अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
10- दसवाँ अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
11- ग्यारहवाँ अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।
12- बारहवाँ अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।
13- तेरहवाँ अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।
साधक जानकारी के अभाव में मन मर्जी के अनुसार आरती उतारता रहता है जबकि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारने का विधान है- चार बार चरणों पर से दो बार नाभिे पर से, एक बार मुख पर से, सात बार पूरे शरीर पर से। इस प्रकार चौदह बार आरती की जाती है। जहां तक हो सके विषम संख्या अर्थात 1, 5, 7 बत्तियॉं बनाकर ही आरती की जानी चाहिए।
पं. कमल किशोर मिश्र
लखीमपुर खीरी
9161007456

Comments
Post a Comment